मांसाहार का जलवायु परिवर्तन क्या प्रभाव है?
मांसाहार का जलवायु परिवर्तन पर क्या प्रभाव है?
इस प्रभाव को समझने के लिए हमें ये समझना आवश्यक है कि मांस का उत्पादन किस प्रकार होता है? बड़े स्केल पर मांस उत्पादन के लिए आपको आवश्यकता है ढ़ेर सारे जानवरों की, उनके लिए खाद्य पदार्थ की, खाद्य पदार्थ को उगाने के लिए खेती योग्य जमीन की, और बहुत ज्यादा मात्रा में जल की आदि।
पहली बात समझने योग्य ये है कि किसी भी जानवर को मांस लायक बनाने के लिए एक समय अन्तराल में बहुत सारे भोजन और पानी की आवश्यकता होती है,क्यूंकि कोई भी जानवर खाने लायक पैदा होते ही नहीं बन जाता एक समय अंतराल वह तैयार होता है । कोई प्लेट में चावल दाल खाता है और दूसरी प्लेट में कोई मांस खाता है तो दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है क्यूंकि जो मांस खा रहा है उसकी प्लेट में एक साथ बहुत सारा अनाज है जो लंबे अंतराल में उस जानवर को खिलाया गया है वह पूरा सम्मिलित है । वहीं जो दाल चावल खा रहा है उसमें मात्र उतना ही अनाज है जितना उस प्लेट में है। यहां से यह बात स्पष्ट होती है कि जब कोई मांस खाता है तो उसके लिए ज्यादा अनाज ,ज्यादा जमीन, और ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है ।
अब कुछ तथ्य समझते है जिसको सुनकर आपको आश्चर्य होगा बहुत सारे शोध यह बताते है कि करीब 75-77% भूमि का उपयोग उस अनाज उपजाने में हो रहा है जो सिर्फ पशुओं को खिलाया जा रहा है ताकी लोग उसका मांस खा सके और मात्र 25-23% भूमि का प्रयोग आम जन के खाने के लिए अनाज उपजाने में हो रहा है।
अब आप समझिए की जब इतनी मात्रा में भूमि का उपयोग मात्र मांस उत्पादन के लिए हो रहा है और हम सब जानते है कि दुनिया की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और कृषि में उपयोग होने वाले hybrid बीज़ जिसमें ज्यादा पानी,ज्यादा उर्वरक का इस्तेमाल होता है जिसके कारण उत्पादन तो ज्यादा होता है लेकिन भूमि की उर्वरता खत्म होती जाती है और एक समय ऐसा आ जाता है भूमि कृषि करने लायक ही नहीं बचती है और साथ ही साथ ज्यादा जनसंख्या बढ़ने के कारण ज्यादा मांस खाने वाले बढ़ रहें है ।
ऐसे में हमारे पास पर्याप्त भूमि इतना ज्यादा अनाज उपजाने के लिए नहीं है , और इस कमी की पूर्ति के लिए ज्यादा जमीन हेतु लगातार जंगलों को काटा जा रहा है ताकि उस भूमि पर पशु कृषि (animal farming) की जा सके। और जब जंगल कटते है तो इसके परिणामस्वरूप कार्बन डाइआक्साइड को सोखने की क्षमता में बड़ी मात्रा में गिरावट आती है और जिसके फलस्वरूप वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ती है जिसके कारण से पृथ्वी का तापमान और बढ़ने लगता है और जब पृथ्वी का तापमान बढ़ता है तो ग्लेशियर पिघलते हैं और जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो नदियों का जलस्तर बढ़ेगा, समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा , इस के कारण से गांव शहर देश डूबने के कगार पर पहुंच जाएंगे ।
मात्र यही नहीं होगा वायुमंडल में तापमान बढ़ने के कारण जलवाष्प की मात्रा भी बढ़ती है जिसके कारण से तापमान में और बढ़ोत्तरी होती जाती है साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के मौसमी बदलाव हो सकते हैं जिसमें कहीं पर बहुत अधिक वर्षा कहीं पर वर्षा की बहुत कमी देखने को मिल सकती है जिससे कृषि प्रभावित होगी और जब कृषि प्रभावित होगी तो लोगों का आम जीवन भी प्रभावित होगा । वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्व औद्योगिक क्रांति से अब तक मैं जो लगातार तापमान की वृद्धि हो रही है अगर वह डेढ़ डिग्री सेल्सियस(1.5° c ) से आगे बढ़ती है तो हम लोगों को महाविनाश देखने को मिलेगा अगर यह है 2 डिग्री को भी पार कर जाती है तो हम कल्पना नहीं कर सकते हैं कि किस तरह का विनाश हमें देखने को मिलेगा।
पहली बात समझने योग्य ये है कि किसी भी जानवर को मांस लायक बनाने के लिए एक समय अन्तराल में बहुत सारे भोजन और पानी की आवश्यकता होती है,क्यूंकि कोई भी जानवर खाने लायक पैदा होते ही नहीं बन जाता एक समय अंतराल वह तैयार होता है । कोई प्लेट में चावल दाल खाता है और दूसरी प्लेट में कोई मांस खाता है तो दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है क्यूंकि जो मांस खा रहा है उसकी प्लेट में एक साथ बहुत सारा अनाज है जो लंबे अंतराल में उस जानवर को खिलाया गया है वह पूरा सम्मिलित है । वहीं जो दाल चावल खा रहा है उसमें मात्र उतना ही अनाज है जितना उस प्लेट में है। यहां से यह बात स्पष्ट होती है कि जब कोई मांस खाता है तो उसके लिए ज्यादा अनाज ,ज्यादा जमीन, और ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है ।
अब कुछ तथ्य समझते है जिसको सुनकर आपको आश्चर्य होगा बहुत सारे शोध यह बताते है कि करीब 75-77% भूमि का उपयोग उस अनाज उपजाने में हो रहा है जो सिर्फ पशुओं को खिलाया जा रहा है ताकी लोग उसका मांस खा सके और मात्र 25-23% भूमि का प्रयोग आम जन के खाने के लिए अनाज उपजाने में हो रहा है।
अब आप समझिए की जब इतनी मात्रा में भूमि का उपयोग मात्र मांस उत्पादन के लिए हो रहा है और हम सब जानते है कि दुनिया की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है और कृषि में उपयोग होने वाले hybrid बीज़ जिसमें ज्यादा पानी,ज्यादा उर्वरक का इस्तेमाल होता है जिसके कारण उत्पादन तो ज्यादा होता है लेकिन भूमि की उर्वरता खत्म होती जाती है और एक समय ऐसा आ जाता है भूमि कृषि करने लायक ही नहीं बचती है और साथ ही साथ ज्यादा जनसंख्या बढ़ने के कारण ज्यादा मांस खाने वाले बढ़ रहें है ।
ऐसे में हमारे पास पर्याप्त भूमि इतना ज्यादा अनाज उपजाने के लिए नहीं है , और इस कमी की पूर्ति के लिए ज्यादा जमीन हेतु लगातार जंगलों को काटा जा रहा है ताकि उस भूमि पर पशु कृषि (animal farming) की जा सके। और जब जंगल कटते है तो इसके परिणामस्वरूप कार्बन डाइआक्साइड को सोखने की क्षमता में बड़ी मात्रा में गिरावट आती है और जिसके फलस्वरूप वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ती है जिसके कारण से पृथ्वी का तापमान और बढ़ने लगता है और जब पृथ्वी का तापमान बढ़ता है तो ग्लेशियर पिघलते हैं और जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो नदियों का जलस्तर बढ़ेगा, समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा , इस के कारण से गांव शहर देश डूबने के कगार पर पहुंच जाएंगे ।
मात्र यही नहीं होगा वायुमंडल में तापमान बढ़ने के कारण जलवाष्प की मात्रा भी बढ़ती है जिसके कारण से तापमान में और बढ़ोत्तरी होती जाती है साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के मौसमी बदलाव हो सकते हैं जिसमें कहीं पर बहुत अधिक वर्षा कहीं पर वर्षा की बहुत कमी देखने को मिल सकती है जिससे कृषि प्रभावित होगी और जब कृषि प्रभावित होगी तो लोगों का आम जीवन भी प्रभावित होगा । वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्व औद्योगिक क्रांति से अब तक मैं जो लगातार तापमान की वृद्धि हो रही है अगर वह डेढ़ डिग्री सेल्सियस(1.5° c ) से आगे बढ़ती है तो हम लोगों को महाविनाश देखने को मिलेगा अगर यह है 2 डिग्री को भी पार कर जाती है तो हम कल्पना नहीं कर सकते हैं कि किस तरह का विनाश हमें देखने को मिलेगा।
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